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2015 से महिलाओं के बीच जाकर शिक्षा की अलख जगा रही हैं ललिता

मुजफ्फरपुर। जरूरी नहीं रोशनी चिरागों से हो, शिक्षा से भी घर रोशन होते हैं…। इस संकल्प के साथ अक्षर ज्ञान के लिए महिलाओं व बच्चों को जागरूक कर रहीं हैं कोल्हुआ पैगम्बरपुर गांधीनगर रोड नंबर तीन निवासी ललिता पांडेय। महिलाओं में अशिक्षा की वजह से बच्चों को शिक्षा से दूर रखने की बात सामने आने के बाद वह शिक्षा व जागरूकता की दिशा में मुहिम चला रही हैं।

इस तरह से मिली प्ररेणा

ललिता पांडेय कहती हैं कि पांच साल पहले कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर गंडक नदी के संगम घाट पर सपरिवार स्नान करने गई थी। वापसी के समय बांध किनारे कुछ बच्चों के झुंड को देखा। बच्चे खेलने में मस्त थे। सभी गोटी-गोटी (ईंट-पत्थर के टुकड़े से खेला जाने वाला खेल) खेल रहे थे। उनसे बातचीत करने की जिज्ञासा हुई। उनके पास रुकी तो बच्चे पहले घबराए। लेकिन जब उनसे बोली कि सबको प्रसाद खिलाना है तो सभी खेलना छोड़ पास आ गए। परिचय पूछने के बाद सवाल किया कि तुम लोग स्कूल जाते हो कि नहीं। उनका जवाब था कि माई कहती है कि पढऩे से क्या होगा, बकरी चराने जाओ…। दिनभर बकरी चराते हैं तथा शाम को घास लेकर घर लौटते हैं। जिस दिन काम कम, उस दिन खाना भी कम मिलता है।

बच्चों की बात सुनकर आश्चर्य हुआ कि शहर के बच्चे कंप्यूटर व मोबाइल चलाते हैं और गांव में अब भी कंप्यूटर के बदले बकरी की रस्सी पकडऩे की मजबूरी है। उसके बाद महिलाओं में अक्षर ज्ञान की भूख जगाने के लिए संकल्पित हुईं।

इस तरह चला अभियान

ललिता बताती हैं कि 2015 से महिलाओं के बीच जाकर शिक्षा की अलख जगाने का सिलसिला चल पड़ा। शुरुआती दौर में मिठनसराय-माधोपुर के मुखिया इंद्रमोहन झा की पहल कर अपनी ओर से माधोपुर में प्रौढ़ शिक्षा केंद्र संचालित की। वहां आने वाली महिलाओं को अक्षर ज्ञान के साथ कॉपी-पेंसिल देती थी। इससे उनमें काफी जागृति आई। अब केंद्र का संचालन नहीं होता। उसके बदले अब गांवों में जाकर जागरूकता फैलाने तथा स्कूली बच्चों को अपने आसपास के निरक्षर को साक्षर बनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। उनके इस मिशन में सरकार की ओर से मिलने वाली पोषाहार व पोशाक राशि का बहुत योगदान है। गरीब परिवार के लिए यह योजना वरदान है। स्कूली बच्चों के बीच पेंसिल, कलम व कॉपी का वितरण करती रहती हैं। इस काम में परिवार एवं समाज का पूरा सहयोग मिलता है।

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