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” स्व0अमजद अली गजनवी:23 वीं पुण्यतिथि( 17 दिसंबर 2018) पर विशेष.. स्मृति अवशेष.. “

रिपोर्ट-गुलाब चंद शर्मा 

1967 के विधानसभा चुनाव के दौरान टिकट वितरण के लिए निजामाबाद की कोर कमेटी बनी जिसके कन्वीनर श्रीमती इंदिरा गांधी थे उस समय तत्कालीन क्षेत्रीय एमएलए श्री पांडे जी को टिकट ना दे करके अमजद साहब को टिकट दिया गया उसी दौरान दिल्ली में त्रमूर्ति भवन में जवाहर लाल नेहरू जी के के साथ आपकी मुलाकात हुई ।इस मुलाकात में उन्होंने बताया कि मैं उसी असद अली का पुत्र हूं, जिन्होंने आपको फेंफना से इंदारा तक ट्रॉली में पहुंचाया था। यह सुनकर के जवाहरलाल भावुक हो गए,उन्हीं भाव क्षणों का यह चित्र है…..

 “अमजद को ढूंढना वह मिलेगा वहीं कहीं ,ईल्मों अमल की जब कोई दुनिया दिखाई दे ।” जीवन वृत्त”. पूर्वांचल के सर जमी पर पर जब भी शिक्षा की अलख जगाने वालों का नाम लिया जाएगा तो उसने अल्लामा शिब्ली नोमानी के बाद दूसरा नाम अमजद अली गजनवी का ही लिया जाएगा ।आजमगढ़ के दक्षिणांचल में मग्ई नदी के तट पर स्थित मोहम्मदपुर गांव में सीमित संसाधनों एवं कठिन परिस्थितियों के बीच 1941 में शिक्षा की ज्योति जगाने का कठिन कार्य आपने अपने दृढ़ निश्चय ता के बल पर पूरा किया ।जब लोग शिक्षा के घने अंधेरे में डूब रहे थे उस समय स्वर्गीय अमजद अली ने गांव को और आसपास के लोगों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया। आपका जन्म मोहम्मदपुर गांव के एक साधारण परिवार में हुआ था ।आपके पिता को जवाहरलाल नेहरू की सहायता करने के कारण रेलवे के पी,डब्लयू ,आई,के पद से हटा दिया गया था ।इन कठिन परिस्थितियो एवम झंझा बातों को झेलते हुए आपकी प्रारंभिक शिक्षा आजमगढ़, गोरखपुर एवं उच्च शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी से संपन्न हुई। आप वकालत पास करके समाज सेवा के क्षेत्र में आए ।यद्यपि आपका संबंध महामना मदन मोहन मालवीय जी से था। उन्होंने कहा था कि अमजद तुम जवाहरलाल से कह कर कहीं अच्छी सी नौकरी कर लो, लेकिन आपने जवाब में कहा था कि मैं भी आप लोगों के सदृश्य समाज की सेवा करना चाहता हूं। इसलिए उन्होंने वकालत का पेशा अपनाया और गरीबों तथा मजदूरों का हक दिलाने के लिए दिन रात मेहनत करते रहे।
आपकी जीवन का दूसरा पहलू आपका शायरी के प्रति लगाव था। आपकी पुस्तक” साह बाय खुदी “पर तमाम छात्र शोध करके एम,फिल, की उपाधि प्राप्त कर चुके हैं ।आपकी शायरी में कभी गुल और बुल बुल की बातें नहीं होती थी ।हिंदू-मुस्लिम एकता, इंसानियत और नौजवानों के लिए प्रेरणादायक गजले रहती थी। “इंसान को खिदमते इंसान से आलम में मिलती है। इंसान के बुलंदी के सामान तस्बीह नही,जुन्नार नहीं ।” आपने शिक्षा की ज्योति जलाई अनंत काल तक आपके नाम को रोशन करती रहेगी ।आपके द्वारा स्थापित कॉलेज में इंटरमीडिएट तक साहित्य, विज्ञान एवं कॉमर्स की शिक्षा दी जाती है ,जिससे आसपास के छात्र-छात्राएं लाभान्वित होते हैं। इस विद्यालय के छात्र-छात्राएं भारत ही नहीं अपितु पूरे विश्व में अपने प्रतिभा को बिखेर रहे हैं ।वकालत के क्षेत्र में पूरे जनपद में आपका कोई मुकाबला नहीं था ।आपने अपना संपूर्ण जीवन इंसानियत की सेवा में लगा दिए। जब भी किसी को कोई जरूरत होती वह सीधे आप कहां पहुंच जाता था, और आप उसकी हर संभव मदद किया करते थे। आपके नरम दिल का एक उदाहरण था जब आप जारे की ठिठु रती रात में अपना कोट उतारकर रिक्शे वाले को दे दिया और स्वयं ठिठुरते हुए घर चले आए। आपकी पूरी जिंदगी इंसानियत के लिए समर्पित थी ।जनता के असीम प्यार ने आपको 1962 में निजामाबाद विधानसभा से अपना विधायक चुनकर आपकी सच्ची लोकप्रियता का सबूत दिया। आपका संबंध जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी ,चौधरी चरण सिंह, सरीखे उच्च कोटि के नेताओं से था। इंसानियत का या मसीहा 17 दिसंबर 1996 को शून्य में तिरोहित हो गया। ” स्वर्ण के अक्षरों में तवा रीख में,उस मनुज की कहानी अमर हो गई ।ज्योति बनकर उजाला किया देश को, खुद तरसता रहा एक किरण के लिए।”

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