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इस जगह रावण का पुतला और झांकियां तैयार करने में चार पीढि़यों से लगा है एक ही परिवार

फतेहगढ़ साहिब। पूरे देश में दशहरे रावण के पुतले का दहन होता है, लेकिन फतेहगढ़ साहिब के एक गांव में इसकी अलग ही परंपरा है। जिले के गांव चनारथल कलां में दशहरे के अगले दिन यानि दशमी तिथि की जगह एकादशी के दिन रावण दहन होता है। इसका कारण एक रोचक प्रकरण बताया जाता है। गांव के लोगों का कहना है कि 157 साल पहले दशहरे के दिन खेतों में चर रहे गायब हो गए थे और एकादशी के दिन लौट आए। इसके बाद एकादशी पर रावण के पुतले का दहन होने लगे। इसके साथ ही गांव के लोगों की मान्‍यता है कि यहां भगवान राम आए थे और एक पीपल के पेड़ की छांव में आराम किया था।

एक घटना से बदली सदियों पुरानी परंपरा

चनारथल कलां को जिले के सबसे बड़ा गांव समझा जाता है। गांव में जिस जगह पर रावण दहन होता है, वहां चौक पर कुंभकर्ण का सीमेंट से बुत बना हुआ है। बताया जाता है कि यह बुत 157 वर्ष पहले बनाया गया था।  इसको बनाने का मकसद गांव के इतिहास को सदैव लोगों के समक्ष रखना है और लोगों को बुराई के प्रति जागरूक करना है। यह बुत दशहरा मनाने वाले स्थान की पहचान भी दिखाता है।

फतेहगढ़ साहिब के गांव चनारथल कलां में एकादशी के दिन होता है रावण दहन , 157 साल से जारी है परंपरा

लोगों की मान्यता है कि इस गांव में भगवान श्री राम आए थे। उन्होंने गांव के बाहर बने छप्पड़ के पास पीपल के पेड़ के नीचे आराम किया था। श्री राम के आराम करने के कुछ समय बाद पीपल को पतासे लगने लगे थे। समय के अनुसार पीपल का पेड़ सूख गया। अब उसका कोई नामो-निशान नहीं रहा है।

इस कारण एकादशी पर होता है रावण दहन

करीब 50 वर्षों से झांकियों में मुख्य सेवादार की भूमिका निभा रहे दरबारा सिंह ने बताया कि 157 वर्ष पहले गांव में दशमी के दिन ही रावण दहन होता था। वर्ष 1861 में गांव में करीब 100 परिवार ही रहते थे। सभी लोग पशु पालक थे। उस समय पशुओं को झुंड के रूप में खेतों में चारा खाने छोड़ दिया जाता था। दशहरे वाले दिन गांव के करीब 400 पशुओं को खेतों में छोड़ दिया गया था। इधर, गांव में दशहरे की तैयारियां चल रही थीं। शाम को रावण दहन होना था।दरबारा सिंह ने बताया कि शाम तक एक भी पशु गांव नहीं लौटा तो खुशी का माहौल गम में बदल गया। उस दिन गांववासियों ने रावण दहन नहीं किया। अगले दिन सभी पशु गांव में लौट आए तो फिर गांववासियों ने एकादशी पर रावण दहन करके खुशी मनाई। उसी दिन से यह परंपरा चलती आ रही है।

दशहरा मनाने की सवा माह पहले शुरू हो जाती हैं तैयारी

दरबारा सिंह बताते हैं कि करीब सात हजार की आबादी वाले इस गांव में दशहरा पर्व मनाने की तैयारी सवा महीने पहले शुरू कर दी जाती है। गांव की श्री रामलीला कमेटी श्री हनुमान जी के झंडा मार्च से इसकी शुरूआत करती है। हनुमान मंदिर में झंडा लगाकर दशहरा पर्व की तैयारियां शुरू की जाती हैं। गांव का दशहरा मेला चार दिनों तक चलता है।

उन्‍होंने बताया कि अष्टमी के दिन इसकी शुरूआत होती है। इस रात से गांव में झांकियां निकाली जाती हैं। इन झांकियों में श्री रामायण के मुख्य अंश शामिल होते हैं। नवमी के दिन से खेल मेले की शुरूआत की जाती है। दो विभिन्न जगहों पर लगने वाले खेल मेले एकादशी के दिन समाप्त होते हैं और फिर रावण दहन किया जाता है।

महज एक हजार रुपये में तैयार हो जाता है रावण का पुतला

गांव में बेहद कम खर्च में प्रदूषण मुक्त दशहरा करीब 133 वर्षों से मनाया जा रहा है। पक्के तौर पर लोहे का रावण तैयार किया हुआ है। उसके सिर के ऊपर मात्र रंग-बिरंगे कागजों की टोपी बनाकर बीच में एक बड़ा पटाखा लगाया जाता है। एकादशी के दिन श्री राम तीर चलाकर दहन करते हैं। दहन में रावण के सिर पर कागजों की टोपी जल जाती है। यह केवल रस्म अदा करने के लिए किया जाता है। हर वर्ष रावण को तैयार करने से लेकर दहन तक मात्र एक हजार रुपये का खर्च आता है। इससे प्रदूषण भी नहीं फैलता।

रावण का पुतला और झांकियां तैयार करने में चार पीढि़यों से लगा है एक ही परिवार

रावण का पुतला तैयार करने और झाकियां निकालने में गांव के ही एक परिवार की चौथी पीढ़ी निश्शुल्क सेवा में लगी है। इन दिनों सेवा संभाल रहे 55 वर्षीय रमेश कुमार ने बताया कि उनके दादा भगत पूर्ण चंद लकड़ी के मिस्त्री थे। शादी के बाद उनके औलाद नहीं हुई थी तो एक विद्वान ने उन्हें गांव में झांकियां निकालने और रावण का पुतला बनाने की  सेवा करने को कहा था। उनके दादा ने गांव में झाकियां निकालने की शुरूआत की। साथ ही, रावण के पुतले की सेवा शुरू की। कुछ समय बाद ही उनके पिता फकीर चंद का जन्म हुआ। दादा के बाद उनके पिता ने इसी सेवा को जारी रखा। अब उनके दोनों बेटे यह सेवा करने लगे हैं।

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